महात्मा बुद्ध किसी परिचय का मोहताज नहीं है हर एक व्यक्ति उनके व्यक्तित्व से जीवन में जरूर प्रभावित हुआ होगा महात्मा बुद्ध ने एक अलग ही धर्म का स्थापना किया जो हिंदू धर्म में बढ़ती कुरीतियों के विरुद्ध था जिसका नाम बौद्ध धर्म रखा।
महात्मा बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था इनका जन्म 563 ई. पू. नेपाल के लुंबिनी कपिलवस्तु में हुआ था उनके पिता क्षत्रिय ( शाख्य गण ) के प्रधान थे इनकी माता महामाया( कोलीन वंश) की राजकुमारी थी.
सिद्धार्थ के जन्म से कुछ दिन पश्चात महामाया की मृत्यु हो गई तो महात्मा बुद्ध का पालन पोषण इनकी मौसी गोतमी ने किया था जो उनकी सौतेली मां भी थी सिद्धार्थ का विवाह अति अल्प आयु में महज ( 16 वर्ष ) के उम्र में यशोधरा नामक एक अति सुंदर स्त्री से हो गई सिद्धार्थ और यशोधरा से उनके घर एक पुत्र का जन्म हुआ जिनका नाम राहुल था।
एक दिन इन्होंने अपने राज्य के नगर में भ्रमण के दौरान चार अवस्थाएं देखें गरीब, बीमार व्यक्ति, वृद्धि व्यक्ति, तथा सन्यासी को देखा जिसके कारण उनके मन में वैराग्य (ग्रह त्यागने ) की इच्छा उत्पन्न हो गई और उन्होंने 29 वर्ष की आयु में अपना गृह त्याग दिया जिसे बौद्ध धर्म में महानिष्क्रमण कहा गया और इसी क्रम में महात्मा बुद्ध जी की 483 ई. पू. कुशीनगर में मृत्यु हो गई
महात्मा बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति
महात्मा बुद्ध ने अलार कलाम से साख्त दर्शन तथा रूद्रकराम से योग दर्शन की शिक्षा ग्रहण किया और महात्मा बुद्ध अपने पांच मित्रों के साथ सारनाथ के मृगदाब वन में तपस्या करने लगे 6 वर्षों तक कठोर तपस्या किया 6 वर्षों के बाद महात्मा बुद्ध सारनाथ से गया आ गए और खूब कठोर तपस्या किया।
यहाँ इन्हें निरंजना ( फाल्गु नदी) के तट पर पीपल वृक्ष के नीचे वैशाख पूर्णिमा के दिन ज्ञान की प्राप्ति हुई ज्ञान प्राप्ति के बाद वह वृक्ष महाबोधि वृक्ष कहलाया तथा यह स्थान बोध गया कहलाया ज्ञान प्राप्ति के बाद इन्हें महात्मा बुद्ध कहा गया बुद्ध का शाब्दिक अर्थ है ज्ञान संपन्न व्यक्ति होता है इन्होंने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया सिद्धार्थ को तथागत , कनकमुनि, शाक्य मुनि भी कहा जाता है साथी ही साथी इन्हे लाइट ऑफ एशिया भी कहा जाता है।
महात्मा बुद्ध के चार सत्य वचन
संसार दुखों से भरा है
सभी के दुखों का कोई ना कोई कारण आवश्यक है
दु:ख का सबसे बड़ा कारण इच्छा है
इच्छा पर नियंत्रण पाया जा सकता है
इच्छा पर नियंत्रण पाने के लिए महात्मा बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग वह दस शील ( मध्य मार्ग व बीच का रास्ता) दिया और कहा व्यक्ति की इच्छा इतनी बड़ी नहीं होनी चाहिए कि वह पूरी नहीं हो सके और इतनी भी छोटी नहीं होनी चाहिए कि पूरा होने पर भी संतुष्ट न हो
दस शील अष्टांगिक मार्ग
अहिंसा सम्यक दृष्टि
सत्य सम्यक संकल्प
अस्तेय ( चोरी ना करना ) सम्यक वाणी
अपरिग्रह (किसी प्रकार की संपत्ति न रखना ) सम्यक क्रमांक
मद्य- सेवन न करना सम्यक अजीव
असमय भोजन न करना सम्यक व्यायाम
सुखप्रद बिस्तर पर न सोना सम्यक स्मृति
धन संचय न करना सम्यक समाधि
स्त्रियों से दूर रहना
नृत्य नाच आदि से दूर रहना
महात्मा बुद्ध के जीवन से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण चिन्ह
गर्व में आने का संकेत- हाथी
जन्म – कमल
गृह त्याग – पद चिन्ह
ज्ञान- बोधि वृक्ष
मृत्यु – स्तूप
महात्मा बुद्ध ने कहा यदि कोई इच्छा अधूरी रहेगी तो वह पूर्व जन्म का कारण बनेगी पुनर्जन्म से छुटकारा पाने के लिए इच्छा को मारना पड़ेगा इसी क्रिया को मोक्ष कहा जाता है
बौद्ध धर्म में चार संगीतिया हुई चौथी बौद्ध संगीति के बाद बौद्ध धर्म दो भागों में बढ़ गया
हीनयान : यह महात्मा बुद्ध के उपदेशों में कोई परिवर्तन नहीं किया इन अवस्था का विशालतम एवं सर्वाधिक विकसित संघ कृतिका कार्यालय ( पुणे )में स्थित है
महायान: यह महात्मा बुद्ध के उपदेशों में परिवर्तन करके उसे आधुनिक रूप दे दिया महायान आगे जाकर ब्रजयान शाखा में टूट गई ब्रजयान शाखा ही बौद्ध धर्म के विनाश का कारण बना क्योंकि इन लोगों ने मूर्ति -पूजा, मद्य – पान, वैसा -वृति को अपना लिया।
बौद्ध धर्म के त्रिपिटक
त्रिपिटक का अर्थ है ज्ञान भरा टोकरी त्रिपिटक श्रीलंका में सिहंलि भाषा में लिखा गया
विनयपिटक
अभिधम्म पिटक
सुतपिटक
महात्मा बुद्ध के प्रिय शिष्य आनंद के कहने पर महिला भिक्षुणी संघ की स्थापना वैशाली में की गई संघ में प्रवेश करने वाली प्रथम महिला भिक्षुणी प्रजापति गौतमी थी।
वैशाली की नगर वधू आम्रपाली भी महात्मा बुद्ध की शिष्या थीं बौद्ध धर्म के अनुयाई कुछ महान राजा भी थे जिनमें बिंबिसार ,अजातशत्रु , मगध नरेश वह कौशल नरेश प्रसनजीत तथा चंद्रप्रद्योत आदि थे