साइंस में चाहे कितना भी तरक्की क्यों ना हो जाए, ” वह केवल कैसे का जवाब दे पाएगा, क्यों? का नहीं डॉक्टर लैरी ब्रिलियंट को पता था कि उनके बेटे की मृत्यु कैसे हुई, लेकिन क्यों? के जवाब के लिए डॉक्टर बेचैन थे। शायद उनके सवाल का जवाब अध्यात्म की गहराई में मिले पर कहां है?ऐसी अध्यात्मिक की गहराई !
ऐसा बहुत कुछ था, जो उनके समझ के परे था ,डॉक्टर बनते ही इनका विवाह हो गया और इन दोनों का एक पुत्र हुआ, जो आगे चलकर कैंसर की वजह से मर गया, बहुत जल्दी ही इस दुनिया को अलविदा कहा गया। डॉक्टर की जैसे खुशी रूठ गई ,साथ ही साथ डॉक्टर के जीने का मकसद भी हो गया बेटे की मृत्यु के बाद उनके मन में तरह-तरह प्रश्न उठने लगे ,
दर्शन एवं अध्यात्म की ओर-लैरी ब्रिलियंट
साइंस चाहे जितना भी डेवलप क्यों ना हो जाए, कैसे? का जवाब दे सकता है , क्यों? का नहीं और वह क्यों का जवाब दर्शन एवं अध्यात्म में खोजने लगे , पर कहां है? अध्यात्म का भारत में बहुत चर्चा होती है, शायद भारत भूमि पर इसका कोई जवाब मिले।
भारत आने के बाद भी यहां भी अच्छे बाबओं और गुरुओं की खोज करना बड़ी मुश्किल काम था , वह अपने क्यों का उत्तर खोजते -खोजते एक बाबा से दूसरे बाबा दूसरे बाबा से तीसरे बाबा तक भटकते रहे , अंत में मन की बात मान लेने वाले बाबा संत लक्ष्मणदास अर्थात नीम करोली बाबा के सन्निध्य उन्हें असीम शांति मिली बाबा ने डॉक्टर लैरी ब्रिलियंट को एक नया नाम दिया सुब्रह्राण्या।
डॉक्टर ने कैंची धाम में रहते हुए अध्ययन और साधना में डूबने लगे उन्होंने तय कर लिया कि अपना सारा जीवन बाबा के सेवा में अर्पित कर देंगे यहां सेवा से श्रेष्ठ कुछ नहीं है।
एक दिन बाबा ने डॉक्टर से सवाल किया , डॉक्टर तुम्हारे पास कितना धन है? और तुम्हारे घर पर कितना डॉलर है, डॉक्टर ने बोला मेरे पास $500 है और मेरे घर पर भी $500 है, बाबा मुस्कुराते हुए बोले तुम कैसे डॉक्टर हो धन भी नहीं कमा सकते, अमेरिकी डॉक्टर को ख्याल आया कि उनकी मां भी बिल्कुल यही वह शब्द बोला करती थी । खैर बाबा अपनी मस्ती में बोले जा रहे थे, you are no doctor/ UNO doctor .
तभी बाबा ने गंभीर होकर कहा, तुम्हें UNO जाना होगा , तुम्हारा अभियान अभी अधूरा है, दुनिया को महारोग चेचक से लड़ने के लिए तुम्हारी जरूरत पड़ेगी अभी तुम्हें लोगों को बचाना है। लोग अमेरिकी शिष्य को जाने का सलाह नहीं देते है, लेकिन यहां बाबा ने अपनी अमेरिकी शिष्य को स्वयं भेजने का फैसला किया , “लोग भी चकित थे” यह क्या हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ चेचक के भयानक बीमारी पर काम कर रही थी, उस टीम में डॉक्टर शामिल होकर भारत की एक भयानक बीमारी चेचक को उखाड़ फेंकने के लिए काम करने लगे, यह मानवता के लिए ईश्वर का उपहार है।
कैंची धाम में रहते-रहते डॉक्टर लैरी ब्रिलियंट भारतीय साधु के वेशभूषा में रंग गए थे, वह यहां के बाबाओ की तरह वस्त्र, लंबे बाल, बड़ी दाढ़ी के साथ डॉक्टर चेचक के उन्मूलन अभियान में लग गए, उनके लगने के साथ ही टीम में एक नया उत्साह पैदा हुआ और लोगों ने खूब मेहनत की 5-6 साल के बाद 1977 में डॉक्टर लैरी ब्रिलियंट सहित विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपने कार्यालय से दवाइयां और वैक्सीन की घोषणा की, की मानवता के लिए सदियों से अभिशाप रहा चेचक जिसकी वजह से लाखों लोग वैक्सीन और दवाइयां ना होने के कारण मौत के गोद में समय से पहले सो जाते थे।
सेवा के प्रति अपने गुरु के निर्देश से प्रेरित डॉक्टर एक के बाद एक अभियानों से जुड़ते चले गए, डॉक्टर ने आगे चलकर अंधता से लड़ने के लिए एक सेवा फाउंडेशन की स्थापना की डॉक्टर आज भी सेवारत हैं , अपने गुरुदेव बाबा नीम करोली को याद करते हैं, और यह बताते थकते नहीं है कि मानवता की सेवा किसी आध्यात्मिक खोज से कम नहीं है।
