द्वारकाधीश मंदिर का इतिहास।

द्वारकाधीश मंदिर ( जिसे जगत मंदिर भी कहा जाता हैं ) भारत के गुजरात राज्य के द्वारका नगरी में स्थित हैं। यह मंदिर भगवान विष्णु के आठवे अवतार भगवान श्री कृष्ण को समर्पित हैं , जिन्हे द्वारकाधीश ( द्वारका के राजा ) के रूप में पूजा जाता हैं।

यह 5 मंजिला इमारत का मुख्य मंदिर हैं , पुरातात्विक निष्कर्ष के अनुसार यह मंदिर 2200-2500 साल पुराना हैं।
यह मंदिर हिन्दू धर्म के चार धामों (पुरी ,रामेश्वरम ,बद्रीनाथ और द्वारका ) में से एक हैं , जो 108 दिव्य देशमो ( वैष्णव परम्परा के पवित्र स्थल ) में भी गिना जाता हैं।

द्वारका का वर्णन महाभारत , पुराणों और भागवत में मिलता हैं , माना जाता हैं की भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरा छोड़ने के बाद कंस के ससुर जरासंघ के आक्रमणों से यादव वंश को बचाने के लिए द्वारका नगरी की स्थापना की , जो भगवान श्रीकृष्ण के आवासीय महल के रूप में भी देखा जाता हैं।

माना जाता हैं की द्वारकाधीश मंदिर का निर्माण भगवान कृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाथ ने करवाया था। इस मंदिर का निर्माण 15वी -16वी शताब्दी में किया गया था , जो पूरी तरह से चुना -पत्थर का उपयोग करके बनाया गया था। मंदिर का शिखर 78 मीटर ऊँचा हैं ,मंदिर के ऊपर एक ध्वज लगा हैं जिस पर सूर्य और चन्द्रमा के चिन्ह अंकित हैं , जो यह दर्शाते हैं की जब तक सूर्य और चन्द्रमा पृथ्वी पर मौजूद रहेंगे , तब तक द्वारका नगरी और श्रीकृष्ण की पूजा होती रहेगी।

मंदिर में दो प्रवेश द्वार हैं , मुख्य प्रवेश द्वार या (उत्तर प्रवेश द्वार ) को “मोक्ष द्वार” कहाँ जाता हैं और दक्षिण प्रवेश द्वार को “स्वर्ग द्वार ” कहाँ जाता हैं। मंदिर के गर्भगृह में भगवान कृष्ण की चार भुजाओं वाली काले पत्थर की मूर्ति स्थापित हैं, जो यह मूर्ति भगवान के राजा रूप को दर्शाती हैं। मंदिर हर दिन सुबह 6 बजे से दोपहर एक बजे और शाम में 5 बजे से रात में 9 बजे तक खुला रहता हैं।

 

द्वारकाधीश मंदिर में मनाये जाने वाले त्योहार और उत्सव में यहाँ का गोगुलाष्टमी और कृष्णजन्माष्टमी उत्सव , द्वारकाधीश मंदिर का सबसे बड़ा उत्सव हैं। इस दिन लाखों भक्त यहाँ भगवान कृष्ण के जन्म का जश्न्न मानते हैं , और साथ ही साथ द्वारका में होली और दीपावली भी बड़े लेवल पर मनाया जाता हैं।

यह जो आप द्वारका देख रहे हैं , यह वह द्वारका नहीं हैं , पहले वाला द्वारका तो समुन्द्र में डूब गया था। हिन्दू कथाओं के अनुसार , महाभारत के युद्ध के बाद श्री कृष्ण के वंशज , यादव कुल आपसी झगड़ों में उलझ गए। यह सब एक श्राप के कारण हुआ , जिससे यादव वंश का विनाश हो गया। श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर अपने उद्देश्य की पूर्ति के बाद अपने दिव्य लोक वापस जाने का निर्णय लिया। कृष्ण के स्वर्गारोहण के पश्चात द्वारका नगरी धीरे-धीरे समुन्द्र में समा गई , इस घटना का उल्लेख महाभारत और भागवत पुराणों में किया गया हैं। समुन्द्र में नगरी के डूबने की यह घटना श्रीकृष्ण की लीला का समापन मानी जाती हैं , द्वारका नगरी के अवशेष आज भी समुन्द्र के निचे मिलते हैं ,जो पौराणिक कथाओं की पुष्टि करते हैं।

एक कहानी के अनुसार संत तुलसीदास जी द्वारकाधीश मंदिर आये। मंदिर में उन्होंने श्री कृष्ण से आग्रह किया की वे अपने राम अवतार का स्मरण कराए , इस पर श्रीकृष्ण ने अपने चरण कमल के निचे राम का नाम लिखा हुआ दिखाया , जिससे तुलसी दास भाव-विभोर हो गए।

द्वारका नगरी से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा सुदामा और श्रीकृष्ण की मित्रता की हैं सुदामा , जो की भगवान कृष्ण के बचपन के मित्र थे , द्वारका आए थे। उनकी गरीबी और कठिनाइयों को देखकर श्रीकृष्ण ने उनका सत्कार किया और उन्हें धन-धान्य से भरपूर कर दिया।

द्वारकाधीश मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण की लीलाओं और उनके आदर्श जीवन का प्रतीक है। यहाँ आने वाले भक्त न केवल भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करते हैं, बल्कि उनकी कथा और जीवन से प्रेरणा भी प्राप्त करते हैं।द्वारकाधीश मंदिर न केवल पौराणिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि आज के समय में इसका सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और पर्यटन की दृष्टि से भी बहुत अधिक महत्व है।

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