Karwa Chauth व्रत प्रेम की पवित्र साधना है। इस साधना में स्त्री श्रद्धा, समर्पण और आध्यात्मिक शक्ति से वैवाहिक जीवन में मंगल की कामना करती है। यह पर्व भारतीय संस्कृति की उस अनुपम परंपरा का प्रतीक है, जहाँ प्रेम, आपसी त्याग, विश्वास, तपस्या और प्रार्थना में अभिव्यक्त होता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को जब आकाश में शरद ऋतु की शीतलता घुलती है और धरती उत्सव के रंग में रंगने लगती है, तब सुहागन स्त्रियाँ करवाचौथ का यह पावन व्रत रखती हैं, हाथों में मेहंदी, मांग में सिंदूर, माथे पर दमकती बिदियाँ और सोहा-सिंगार से सजी स्त्रियाँ अपने प्रेम को एक पवित्र संकल्प का स्वरूप देती हैं। Karwa Chauth व्रत की शक्ति इसके पौराणिक कथाओं में निहित है।
Karwa Chauth : की पौराणिक कथाएँ।
करवाचौथ का व्रत के पौराणिक कथा का हिंदू धर्म में बहुत महत्व है। प्रेम, विश्वास और वैवाहिक जीवन का प्रतीक माने जाने वाला इस व्रत को विवाहित महिला अपने पति के लंबे उम्र के लिए करती हैं। करवाचौथ पर मुख्यतः दो पौराणिक कथाएँ सुनी जाती हैं। पहला है ‘वीरावती’ की, तो दूसरी कहानी है ‘करवा’ की। दोनों ही कथाएँ धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखती हैं।
Karwa Chauth पर सुने विरावती की कहानी।
कथा तब शुरू होती है जब अर्जुन तपस्या के लिए पर्वत पर चले जाते हैं और पीछे से पांडवों पर एक के बाद एक संकट आ रहे थे। तब चिंतित मन से द्रौपदी ने श्रीकृष्ण से पूछा कि ऐसा कौन सा व्रत है जिसको रखने से सारी संकट दूर हो जाएगी। तब श्रीकृष्ण बोले, यही प्रश्न एक बार पार्वती जी ने भगवान शिव से पूछा था, शिव जी ने उन्हें करवा चौथ का व्रत बताया। फिर श्रीकृष्ण ने उनकी कथा सुनाई।
इंद्रप्रस्थपुर में देवशर्मा नाम के एक विद्वान ब्राह्मण परिवार रहता था। उनके सात बेटे थे और एक बेटी विरावती। सात भाइयों में अकेली बहन होने के कारण वह सबकी लाडली थी। समय आने पर उसका विवाह वेदान्त जानने वाले एक योगब्राह्मण युवक से हुआ।
विवाह के बाद पहली करवा चौथ आई, तब विरावती अपने मायके में थी। उसने अपने भाभी के साथ सूर्योदय से व्रत रखा हुआ था। शाम होते-होते भूख प्यास से उसका बुरा हाल होने लगा और वह चाँद निकलने से पहले बेहोश होकर गिर पड़ी। घरवाले रोने लगे और पानी के छींटे देकर पंखे को झलकर उसे होश में लाए।
भाइयों से अपनी बहन का यह हालत देखी न गई। उन्हें पता था कि विरावती चाँद को अर्ध्य दिए बिना अन्न – जल को ग्रहण नहीं कर सकती है। तब एक भाई ने बड़े से बरगद के पेड़ पर चढ़ गया और छलनी की ओट में दीपक जलाकर ऐसी रोशनी की वह उगते चाँद जैसा दिखे। भाभियों ने विरावती को छत पर लायी और बोली देखो चाँद निकल आया। विरावती ने उसे चाँद समझकर अर्ध्य दिया और भोजन करने बैठ गई।

पहला कौर लिया तो उस कौर में बाल मिले, दूसरे में छीक आई और तीसरे कौर में उसके ससुराल से बुलावा आ गया। विरावती घबराई हुई ससुराल पहुँची थी, तो उसने अपने पति को मृत पाया । वह फुट-फुटकर खूब रोने लगी और सोचने लगी कि उससे ऐसी कौन सी गलती हो गई।
उसकी रोने की पुकार सुनकर देवराज इंद्र की पत्नी इंद्राणी वहाँ आती हैं। उन्होंने बताया, तुमने चंद्रमा निकलने से पहले अर्ध्य देकर व्रत को तोड़ दिया था, इसलिए यह संकट आया। अब तुम साल भर हर महीने के चौथ का व्रत करो और अगली करवा चौथ का व्रत पूरी विधि -विधान से करो। विरावती ने पूरे महीने के चौथ का व्रत पूरी विधि -विधान से किया और फिर आने वाले करवा चौथ का भी व्रत किया। इस व्रत के पुण्य से विरावती के पति फिर से जीवित हो जाते हैं।
श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को भी यही व्रत रखने को कहा। द्रौपदी ने करवा चौथ का व्रत किया और इस व्रत के प्रभाव से पांडवों के संकट दूर हो गए।
Karwa Chauth की दूसरी कहानी करवा और मगरमच्छ की
प्राचीन समय में एक गाँव के नदी के किनारे करवा नाम की एक पतिव्रता स्त्री रहती थी। उसके पति कमजोर हो चुके थे। वो एक दिन नदी में स्नान करने के लिए जाते हैं तो एक मगरमच्छ उनका पैर पकड़ लेता है और उसे पानी में खींचने लगता है। पति ने अपनी पत्नी करवा को पुकारा, करवा! करवा!
करवा दौड़कर आती है और मगरमच्छ को बांध लेती है और वह यमराज से मदद की पुकार लगती है। यमराज करवा की अपने पति के प्रति निष्ठा और साहस को देखकर उसके पति को मगरमच्छ से छुड़ाते हैं और करवा के पति को लंबी आयु का प्रदान देते हैं।
यमराज करवा को यह वचन देते हैं कि जो स्त्री इस दिन व्रत रखेगी, उसके सुहाग की वे रक्षा करेंगे। वह दिन कार्तिक कृष्ण चतुर्थी का था और तभी से यह व्रत करवा के साहस और निष्ठा का प्रतीक बना, जिससे करवाचौथ के नाम से जाना जाता है। यह कामना किया जाता है कि हे करवा माता, जैसे अपने पति के प्राणों की रक्षा किया, वैसे ही हम सबके पति के प्राणों की रक्षा करना।
Karwa Chauth 2026 : का शुभ मुहूर्त।
इस बार करवाचौथ 29 अक्टूबर के दिन बृहस्पतिवार को पड़ रहा है। पंचांग के अनुसार चंद्रमा उगने का समय शाम 7 बजकर 57 मिनट पर है। चंद्रमा के दर्शन हो जाने पर करवाचौथ का पूजन पूरे विधि-विधान से संपन्न होगा।
जो महिलाएं पहली बार करवाचौथ का व्रत कर रही हैं, इस संयोग में व्रत करने से उन्हें अखंड सौभाग्य, संतान और सुख का वरदान प्राप्त होगा। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बृहस्पति की शुभ स्थिति समृद्धि, संतान सुख और वैवाहिक जीवन में मंगलकारी प्रभावों को बढ़ाती है। इस शुभ संयोग में परंपरा के अनुसार विधि-विधानपूर्वक व्रत रखें, जिससे सर्वसुख की प्राप्ति हो।
मन में सकारात्मक भाव रखते हुए बृहस्पति देव का आशीष लें और चंद्र, आदि भगवानों की पूजा जरूर करें। नकारात्मक भाव को दूर करने के लिए कार्तिक मास कृष्ण पक्ष में पड़ेले वाले करवाचौथ को 21 बेशन के लड्डू बनाकर किसी धार्मिक स्थल पर आवश्य भेट करें। करवाचौथ के दिन रोहिणी नक्षत्र दोपहर तक रहेगा फिर उसके बाद मृगशिरा नक्षत्र में चंद्रमा दर्शन होगा। इसके बाद पूजन से व्रत समाप्त होगा।
Karwa Chauth के व्रत की पूजन विधि

करवाचौथ का व्रत सूर्योदय से शुरू हो जाएगा और रात में चंद्रमा के दर्शन और पूजन करने के बाद करवाचौथ का व्रत संपूर्ण होगा। जानें यह संपूर्ण पूजा विधि और व्रत खोलने का सही तरीका।
सबसे पहले सुबह उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें,
फिर पूजा की सामग्री को तैयार करें, जैसे भगवान शिव और माता पार्वती के साथ-साथ भगवान गणेश जी की मूर्ति, मिट्टी का कलश, जल, या अर्ध देने के लिए ताबे का लोटा, कुमकुम और दही, अक्षत, फूलों की माला और कुछ फूल, धूप, मिठाई, फल, गेहूं या चावल, छलनी और पूजा की थाली के साथ व्रत कथा की पुस्तिका भी तैयार करें।
भगवान शिव और पार्वती की पूजा करें,
करवाचौथ की व्रत कथा सुनें,
चंद्रमा निकलने के बाद चंद्र देव की पूजन करें,
छलनी से चंद्रमा और अपने पति के दर्शन करें,
पति के हाथ से पानी पीकर व्रत खोलें।
Karwa Chauth व्रत से हमें यह सीख लेनी चाहिए कि जब प्रेम पूजा बन जाए, समर्पण साधना बन जाए और विश्वास जीवन का आधार बन जाए, तब विवाहित जीवन के संबंध दो आत्माओं के सुंदर संगम का रूप ले लेती है।



















