पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन की सनातन परंपरा आज से शुरू हो रहा है पितृ पक्ष क्यों जरूरी है । श्राद्ध कर्म क्या, इसकी वास्तविकता मर्म को आज के युवा पीढ़ी को समझना जरूरी है।
साल में केवल दो ही पक्ष को हम लोग ज्यादातर जानते हैं, शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। लेकिन इसके अलावा पूरे साल में केवल एक ही ऐसा पक्ष है, जिसे न शुक्ल पक्ष और न कृष्ण पक्ष कहते हैं, बल्कि इसे पितृ पक्ष या श्राद्ध पक्ष कहते हैं। इस पक्ष में चंद्रमा अमावस्या की तरफ बढ़ती है और अनंत काल में विलीन हो जाती है। अमावस्या के इस तिथि को , चंद्रमा को सूर्य के प्रति समर्पण, की तिथि मानी जाती है। सभी सांसारिक लोग भी इसी चंद्रमा की तरह हैं, जो अपने पूर्वजों और पितरों के प्रतापरूपी ज्योति से प्रकाशित होते रहे हैं। आज हमारे पास जो कुछ भी है या भविष्य में जो कुछ भी होगा, वो सब हमारे पूर्वजों और पितरों के असीम कृपा का परिणाम है।
हमें इस के लिए अपने पूर्वजों के प्रति नमस्तक होना चाहिए कृतज्ञता ज्ञापन ही मनुष्य के अहंकार की मुक्ति का सबसे बड़ा मार्ग है।
सफल होते हैं पितृ पक्ष में किए गए कार्य।
श्राद्ध परंपरा के सभी दिशाओं में देवताओं, ऋषियों, मुनियों, यमराज आदि सबका नाम लेकर तर्पण किया जाता है। कृतज्ञता ज्ञापन की इस, चले आ रहे परंपरा के लिए ही तो गंगा का अवतरण हुआ, भगवान का अवतरण हुआ और हमारी वंशजों को यह ज्ञान दिया कि जो हमारे थे, जो हमारे होंगे, हम उन सब को याद करें। यही हमारी दिव्य सनातन की परंपरा है।
हमारे दादा-दादी, माता-पिता अपनी अंतिम सांस तक केवल अपने ही संतति का उत्कर्ष ही चाहते थे। आज भी उनका आशीष हमारे साथ है, जबकि पितर इस्वर में विलीन हो चुके हैं। अश्विन मास के कृष्ण पक्ष के वे 15 दिन, जिसमें हम अपने पूर्वजों की पावन स्मृति में लीन रहते हैं। यह काल भले ही अंधकार का काल हो पर हमें हमारे पूर्वज हमारे अंतःकरण को हमेशा शुक्लवर्गीय (प्रकाशमान और पवित्र) बनाए रखते हैं।इस पक्ष में किया गया कोई भी श्रेष्ठ कार्य अवश्य सफल होता है। क्योंकि इस काल में हमारे पितृजन जागृत रहते हैं।असहाय लोगों की सेवा, धार्मिक अनुष्ठान, सत्संग, कथा कीर्तन से श्राद्ध पक्ष में कई गुना अधिक लाभ की प्राप्ति होती है।
श्राद्ध पक्ष बलिदानों का स्मरण।

श्राद्ध का अर्थ केवल हमारे पूर्वजों तक सीमित नहीं है। जब हम श्राद्ध पक्ष में अपने पूर्वजों के लिए दीपदान करते हैं या जलदान देते हैं तो अनजाने में ही सही हम उन सभी वीरों, ऋषियों और देशप्रेमियों के प्रति भी अपना कृतज्ञता को ज्ञापित कर रहे होते हैं। जिन्होंने समाज के प्रति अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। तर्पण के समय संस्कृति में एक मंत्र कहा जाता है।
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः।
तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः॥
अर्थ – ब्रह्मा से लेकर हर एक तिनके तक इस संसार में जितने भी देव, ऋषि, मुनि, माता-पिता और पूर्वज हुए हैं, और जो इस देश और समाज के भलाई के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी, वो हमारे व्यापक पितृ-चेतना के हिस्सा हैं। वे सब हमारे तर्पण से कृतज्ञ हैं।
श्राद्ध का मूल समझे युवा पीढ़ी
किसी भी सिद्धांत या नियम की एक सुनिश्चित एवं पवित्र संहिता होती है, चाहे वह सुनने की परंपरा से हुई हो या अध्ययन से , श्राद्ध भी हमारी धार्मिक परंपरा की एक ऐसी ही तीव्र शाखा है। यह बहुत जरूरी है आज के युवा पीढ़ी को, कि वो अपने सुनने की परंपरा पर विश्वास करें। शास्त्रों में गया जी में श्राद्ध के बिलय का विधान इसलिए किया गया है, कि जिसका आगे कोई वंशज न हो। वह अगले जन्म में निर्वश न रहे। कर्तव्यों की पूर्ति भले ही गया जी में पिंडदान करने से पूरा हो जाए पर भाव की स्मृति तो पितरों के प्रति सच्ची श्रद्धा और हमारे प्रति किए गए उनके उपकारों के स्मरण से ही होगा।
हर साल श्राद्ध करके हम अपने भाव की पूर्ति करते हैं। और इसी के साथ अपने को धन्य करते हैं। और में युवा पीढ़ी से कहना चाहता हूँ कि जब हम अपने पालतू पशु जैसे (तोता) के प्रति इतना कृतज्ञ हो सकते हैं, कि सुबह से लेकर शाम तक उसकी सारी ज़रूरतों को ध्यान में रखते हैं, और उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं, यहाँ तक कि हम उनको अपने घर का सदस्य मानते हैं और ये सब करते हुए हमें ज़रा भी थकान महसूस नहीं होती, न ही कोई संकोच । तो फिर हम अपने पितरों के लिए वर्ष में एक दिन उनके स्मृति के लिए क्यों नहीं? जिन्होंने जीवन भर हमारे लिए संघर्ष किया और अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया उन्होंने हमारे कुशलता के लिए भगवान से हमेशा प्रार्थना की क्या हमारे मन में अपने पूर्वजों के प्रति कोई कृतज्ञता का भाव नहीं होना चाहिए?
















