Mount Everest दुनिया की सबसे ऊँचा पर्वत है। इसकी ऊँचाई लगभग 8,848 मीटर है। और इसी में दफ़न हैं Green Boots का रहस्य , माउंट एवेरेस्ट में अत्याधिक ऊँचाई होने के साथ – साथ हिमनदों, बर्फीली ढलानों और दुर्लभ मौसम के कारण यह विश्व में सबसे चुनौतीपूर्ण पर्वतारोहण स्थलों में गिना जाता है। माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करना जितना मुश्किल है, उससे कहीं ज्यादा कठिन है वहाँ से किसी शव को वापस नीचे लाना।
1996 में आए भीषण तूफान।
1996 में आए हुए भीषण तूफान की घटना को आमतौर पर इसे 1996 Mount Everest Disaster. के नाम से भी जाना जाता है। इस समय अलग-अलग पर्वतारोहियों के कुल आठ लोगों की जान गई थी, जिसमें से पाँच पर्वतारोहियों की मौत नेपाल की ओर से चढ़ाई करने वाले रास्ते पर हुई और तीन तिब्बत की ओर से आने वाले रास्ते से भारतीयों की मौत हुई। इन पाँच पर्वतारोहियों में रॉब हॉल, एंडी हरीश, डग हैनसन, यासुको और स्कॉट फिशर थे, जिनमें से सबकी मौत हो गई।
वहीं भारतीय पर्वतारोही में तीन लोग में सुबेदार तेवांग समनला , l लांस नायक दोरजे मोरुप और तेवांग पाल्जोर थे। इन्होंने रेडियो से चोटी पर पहुँचने की खबर दी थी, लेकिन इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं है, कि सच में ये लोग सर्वोच्च बिंदु पर पहुँचे थे या नहीं। खराब मौसम की वजह से किसी पास के चोटी को ऊँची चोटी का हिस्सा मान लिया था।
अचानक मौसम खराब हुआ और बर्फबारी शुरू हुई, ठंडी तेज हवाएँ चलने लगीं लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।
Green Boots का रहस्य।
तीन भारतीय पर्वतारोहियों को लापता हुए लगभग तीन दशक हो चुके हैं। तीन दशकों से 300 मीटर नीचे बर्फ में जमे हुए एक जमकीले हरे जूते को पर्वतारोही पीढ़ियों में Green Boots के नाम से जाना जाता था। इस Green Boots के रहस्य का खुलासा हाल ही में किया गया।
एक गुप्त अभियान के दौरान हुआ , जब शेरपाओं की टीम ने उनका डीएनए सैंपल जाँच कराया तो इस सैंपल की पहचान उत्तरी भारत के दोरजे मोरुप पर्वतारोही के रूप में हुई, जिनकी उम्र 47 साल की थी, जो भारत तिब्बत सीमा पुलिस बल में कार्यरत थे, जो 1996 में माउंट एवरेस्ट डिजास्टर के शिकार हो गए थे।
भारत सरकार ने इस शव को वापस लाने का जोखिम भरा मिशन को शुरू किया। तीस साल से बर्फ में जमे इस शव को ‘ डेथ जोन ‘ से वापस लाने की चुनौती किसी मिशन इंपॉसिबल की तरह ही है।
8000 मीटर ऊपर जाना मौत को चुनौती देने के बराबर है, क्योंकि उसके बाद ऑक्सीजन लेवल बहुत कम हो जाता है, जिससे साँस लेने में भी तकलीफ होने लगती है। इस मरे हुए शव को लाने में कई जिंदा लोगों की जीवन जोखिम में पड़ सकती है।
1996 में हुआ इस घटना को जान क्राकाउर ने अपनी पुस्तक Into Thin Air में इस हादसे का प्रत्यक्ष अनुभव को लिखा है। बाद में यह पुस्तक दुनिया भर में बहुत चर्चित रही लाखों पाठकों के प्रिय पुस्तकों में से एक रही।
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