भारत सरकार का मिशन 2035 तक अपना space station बनाने का है, जिस पर ISRO काम कर रही है। इसरो ने सफलतापूर्वक क्रू मॉड्यूल का परीक्षण किया। ISRO के गगनयान मिशन के जरिए लोगों को अंतरिक्ष में सुरक्षित भेजने एवं लाने का कई सफल परीक्षण किया, अर्थात crew module and service module को अलग करने वाली सिस्टम का कई बार सफल परीक्षण किए गए, क्योंकि इसरो अपना G1 इसी साल लॉन्च करेगा। ये पहला मानवरहित गगनयान मिशन है। जिसके परीक्षण को एक बड़ी सफलता मानी जा रही है।
crew module and service module कैसे काम करते हैं।
अंतरिक्ष में जाने वाले गगनयान के ऑर्बिटल मॉड्यूल में दो भाग होते हैं। पहले को क्रू मॉड्यूल और दूसरे को सर्विस मॉड्यूल के नाम से जानते हैं। क्रू मॉड्यूल का काम लोगों को सुरक्षित रखना, या ये बोल सकते हैं कि मिशन के दौरान सारे यात्री इसी क्रू मॉड्यूल में ही रहते हैं। और सर्विस मॉड्यूल का काम मिशन के दौरान जरूरी सेवाएं और सहायता प्रदान करना होता है। दोनों ही मॉड्यूल को किसी खास सिस्टम के साथ जोड़ा जाता है ताकि मिशन के दौरान दोनों साथ में काम करें।
मिशन कम्प्लीट करने के बाद जब अंतरिक्ष यात्री वापस लौटेते हैं तो उस समय क्रू मॉड्यूल एवं सर्विस मॉड्यूल को अलग करना पड़ता है। इसे अलग करने के लिए एक विशेष प्रकार के विस्फोटक उपकरण या किसी तकनीकी से अलग किया जाता है। यह प्रक्रिया पूरी क्रमशः एक बार में होनी चाहिए, नहीं तो क्रू मॉड्यूल पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ सकता है। अलग होने के बाद सर्विस मॉड्यूल अंतरिक्ष में रह जाएगा और क्रू मॉड्यूल सुरक्षित धरती पर लौट आता हैं।

भारत सरकार का सपना 2035 तक space station का
लेकिन गगनयान मिशन के तहत यह मॉड्यूल समुद्र में उतरेगा। भारत सरकार का भी योजना 2035 तक अंतरिक्ष स्टेशन बनाने का हैं। जिसमे कर रहा है मदद गगनयान मिशन, जैसे गगनयान के मॉड्यूल को अलग करने का टेस्ट हो रहा हैं , ठीक इसी प्रक्रिया से अंतरिक्ष स्टेशन को भी बनाए जाएंगे।
अंतरिक्ष स्टेशन बनाने के लिए अंतरिक्ष में अलग-अलग मॉड्यूल को जोड़ना पड़ता है और उन्हें अलग-अलग कर के जोड़ना भी जरूरी होता है। इस परीक्षण का उद्देश्य ही है जुड़े हुए मॉड्यूल को अलग करना।
2025 में दो अलग-अलग यानों को भी आपस में जोड़ा गया था, यानी डॉकिंग का भी सफल परीक्षण किया जा चुका है। अब भारत ज़्यादा दूर नहीं है अपने space station के सपने से।

कहा किया गया परिक्षण
इसरो ने इसका परीक्षण तिरुवनंतपुरम स्थित विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र में किया था। पहले दो मॉड्यूल को जोड़कर एक सरल और ऑर्बिटल मॉड्यूल बनाया गया। परीक्षण के दौरान दो मॉड्यूल को अलग किया गया और देखा गया कि किसी झटके से क्रू मॉड्यूल पर कोई खतरा तो नहीं।












