कर्नाटक के हम्पी में स्थित विरूपाक्ष मंदिर अपने बेमिसाल नक्काशी के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। कृष्णदेव राय का राजाभिषेक विरूपाक्ष मंदिर के परिसर में हुआ था। स्थानीय देवी पंपा की उपासना केंद्र रहा। इस मंदिर का इतिहास को जानते हैं आस्था का संगम रहा विरूपाक्ष मंदिर का रहस्य।
देवी पंपा का इतिहास विरूपाक्ष मंदिर।
हम्पी में विरूपाक्ष मंदिर तुंगभद्रा नदी के किनारे स्थित है। यह विजयनगर डाइनस्टी के स्थापत्य के सबसे महत्वपूर्ण उदाहरणों में से एक है। इसका सबसे प्राचीनतम उल्लेख सातवीं- आठवीं ईस्वी में मिलता है। तब उस समय इस मंदिर में पूजा, स्थानीय देवी पंपा की होती थी।
पौराणिक कथाओं के अनुसार देवी पंपा को शिव भगवान के रूपों में से एक रूप विरूपाक्ष की पत्नी के रूप में बताया गया है। सातवीं- आठवीं शताब्दी से चौदहवीं शताब्दी से पहले यहाँ देवी पंपा की पूजा हुआ करती थी। प्रारंभिक विजयनगर के लोगों के लिए विरूपाक्ष एक सर्वसक्तिशाली और महत्वपूर्ण देवता हुआ करते थे।

इसके बाद संगम और तुलूव वंश के शासकों ने पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी के लगभग इस मंदिर का व्यापक पुनर्निर्माण और विस्तार कराया। कभी यह मंदिर स्थानीय देवी पंपा की उपासना केंद्र हुआ करती थी और इस मंदिर में सिर्फ देवी पंपा की पूजा हुआ करती थी। आज के दिन में देखा जाए तो देवी पंपा के मंदिर में उपस्थिति उत्तर की तरफ एक छोटे से मंदिर तक ही सीमित है।
पंद्रहवीं शताब्दी के आसपास इस मंदिर में संगम वंश के शासनकाल में उत्तरी गोपुरम जोड़ा गया। इसके बाद 1510 के लगभग तुलूब वंश के शासन में कृष्णदेव राय ने एक खुला लंबा मंडप बनवाया। इस मंडप की आकृति बहुत ही अच्छी तरह डिजाइन की गई थी। केंद्रीय सभा मंडप के स्तंभों से लेते हुए हर कोने के पायों तक पूरा अच्छी तरह डिजाइन की गई थी। इस मंदिर में हर जगह रूपांकन दिखाई देता है।
विरुपाक्ष मंदिर का गोपुरम और प्रांगण : इस मंदिर में कई प्रांगण हैं जिसमें से सौ स्तंभ वाला एक मंडप प्रसिद्ध है। इस मंडप के स्थंभों पर तरह- तरह के आकृति, डिजाइन भी बनी हुई है। गोपुरम पूर्व दिशा की ओर मुख किए हुए एक नौ मंजिला वाली संरचना है, इसके नीचे की दो मंजिला पत्थर से निर्मित है, और आगे के भाग ईंट और गारे से निर्मित है, जिससे पर बनी हुई आकृतियाँ दिखाई देती हैं। और इस मंदिर के गर्भगृह में शिव लिंग स्थापित है। और इस गर्भगृह के द्वार पर दो द्वारपाल दो मीटर ऊँचे स्थापित किए गए हैं। गर्भगृह के चारों तरफ प्रदक्षिण- पथ बनाया गया है।

विरुपाक्ष मंदिर की विशेषताएँ : कहा जाता है कि इस मंदिर के परिसर की ओर जाने वाले पूर्वी रास्ते को तुलूव राजाओं के द्वारा ही बनवाया गया था। स्तम्भ पंक्तियों और बीच-बीच हमें खड़े ऊँचे खंभों में जो आकृतियाँ उकेरी हुई दिखाई देती हैं। वो मंदिर की सुंदरता को सुसज्जित करती हैं। यह मार्ग एक ऐसे मंडप पर समाप्त होती है, जहाँ से विजयनगर साम्राज्य के स्तम्भों का उपयोग किया गया है।
मंदिर को विशेष रूप से कृष्णदेव राय द्वारा बनवाया गए थे। यह मंदिर अपने छत के चित्रीत नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है जिसमें अनेकों हिंदू देवताओं के जीवन से जुड़ी बहुत सारे दृश्य को चित्रित किया गया है। इस मंडप के तीन खंड हैं, जिसमें से बीच वाला खंड बाकी दोनों खंडों से कहीं अधिक चौड़ा होने के साथ-साथ दोनों खंडों से ऊँचा भी उठाया गया है। और इनके छत का भितरी भाग भी चित्रों से सजाया गया है। और इस को आठ असमान आकृतियों में विभाजित किया गया है, जिसके आगे का भाग वर्गाकार खंडों में विभाजित किया है, जिससे इन खंडों के बीच ज्यामितीय और पुष्कीय अलंकरों की आकृतियाँ भी उकेरी गई हैं।
विरुपाक्ष मंदिर कर्नाटक, हम्पी के स्मारक – समूह का एक अभिन्न हिस्सा है जिसे- यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है।
















